मप्र में अब व्यापमं से भी बड़ा तीन लाख करोड़ का टेंडर घोटाला!!

मध्यप्रदेश का ‘ई-टेंडर घोटाला’ व्यापम घोटाले से भी बड़ा सिद्ध हो सकता है। करोड़ों अरबों रुपये के टेंडर मनचाही कम्पनियों को दिए जा रहे हैं। बताया जा रहा है कि घोटाला करीब 3 लाख करोड़ का है।
जिस परियोजना का उद्घाटन करने पीएम मोदी मध्यप्रदेश के राजगढ़ जिले में जाने वाले थे, उस परियोजना की टेंडर प्रक्रिया में सबसे पहले यह घोटाला सामने आया। कमाल की बात तो यह है कि जिस आईएएस अफसर मनीष रस्तोगी ने यह घोटाला पकड़ा है, उससे शिवराज सरकार ने आईटी विभाग ही छीन लिया, जिस अधिकारी ने व्हिसल ब्लोअर बन कर इस मामले का खुलासा मनीष रस्तोगी के सामने किया उसे भी दूसरे विभाग में भेजा जा रहा है।
शिवराज सरकार ने सरकारी ठेके ई टेंडर के माध्यम से देने की पहल की थी भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था के लिये ई- टेंडर को जरूरी बताया जा रहा था लेकिन इसमें सामने आई गड़बड़ी से यह पूरी व्यवस्था व इसमें अभी तक शामिल लाखों करोड़ों के सभी ई-टेंडर संदेह के घेरे में हैं।
दरअसल ये सिर्फ एक परियोजना के टेण्डर की बात नहीं है। अब तक इस मामले में 1500 करोड़ का घोटाला पकड़ा जा चुका है, और अभी बस शुरुआत हुई है। बताया जा रहा है कि इसमें सीएम शिवराज सिंह के नजदीकी कहे जाने वाले पांच आईएएस अफसर शामिल हैं।
जिस तरह से यह घोटाला किया जा रहा है, वह डिजिटल इंडिया पर ही सवालिया निशान लगा रहा है। साफ दिख रहा है कि ई-पोर्टल में छेड़छाड़ से दरें संशोधित करके टेंडर प्रक्रिया में बाहर हो रही कंपनी को टेंडर दिलवा दिया जाता था। ऐसा करके मनचाही कंपनियों को कांट्रेक्ट हासिल हो जाता था। ईओडब्ल्यू की शुरुआती जांच में मुंबई के दो आईपी एड्रेस से टेंडरों में टेंपरिंग किए जाने का पता चला है। आईपी की पड़ताल होने के बाद यह पता चला हैं कि डिजिटल सिग्नेचर के कोड बदल दिए गए हैं।
याद कीजिए कुछ इसी तरह से नीरव मोदी का पीएनबी घोटाला भी पकड़ाया गया था। यहाँ भी वही मोडस ऑपरेंडी अपनाई गई है। सबसे बड़ा तुर्रा तो यह है कि इनकी सरकार ‘न खाऊंगा न खाने दूंगा’ की बात करती है लेकिन मौका मिलते ही अधिकारियों के साथ जमकर मिल बांट के खाती है।
भास्कर की एक खबर के अनुसार हैकर्स ने पिछले माह कंपनी के डिजिटल सिग्नेचर बदल दिए थे। इस सिग्नेचर के जरिए ई प्रोक्योरमेंट के संचालक टेंडर बिड को अथेंटिकेट करते हैं। टेंडर में गड़बड़ी सामने आने के बाद जब अधिकारियों ने अपने डिजिटल सिग्नेचर डालकर उसके हैश से अथेंटिकेशन करना चाहा तो नहीं हो सका। हैश किसी बैंक लॉकर कि दूसरी चॉबी की तरह होता है जो बैंक के पास होती है। वह उसे ग्राहक की चाबी लगाने के बाद लगाकर लॉकर खोलता है। यह खुलासा होने के बाद अधिकारी हतप्रभ रह गए। उन्होंने तत्काल इसकी जानकारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों को दी थी।
(स्त्रोतः गिरीश मालवीय की फेसबुक पोस्ट)

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