अपने नाम का अक्षर अक्षर जिया है आपने

गुरुवार देर रात रामचंद्र सिंह देव चले गए। हम उन्हें महाराज साहब कहते थे। उनके लंबे नाम को छोटा करके उनका दूसरा संबोधन कैसे बनाते। आखिर में कोरिया रियासत के वे राजा तो थे। मुख्यालय बैकुंठपुर में मेरे सबसे छोटे मामा वकील थे। उनसे महाराज साहब की गाढ़ी छनती थी। मेरे ममेरे भाई अब भी वहां वकील हैं। उन्होंने कई बार कहा चलो मेरे साथ मेरे साथ रहो। अब मैं तुम्हारा मामा हो गया हूं। वह दिन कभी नहीं आया। आखिरी कुछ महीने वे बेहद बीमार हो चले थे।

छत्तीसगढ़ के राजनेताओं में या तो वे सबसे ज्यादा या अकेले बुद्धिजीवी थे। उनकी ख्याति एक बेहद आदर्श और ईमानदार राजनेता, वित्तमंत्री, योजनाकार, सिंचाई विशेषज्ञ और प्रशासन की विधियों के पारंगत अध्येता के रूप में रही है। मैं पांच साल भोपाल में सरकारी राजनीतिक पद पर था। तब वे नियम से मेरे पास आया करते थे। कुछ और पुराने नेता भी उसी तरह पूर्व विधायक शिवकुमार श्रीवास्तव और रामचंद्र वाजपेयी भी।

महाराज में भाषा का स्नेह था और स्नेह की भाषा थी। वे उत्तेजित नहीं होते थे। अपनी बात को किसी तार्किक या जिरहकर्ता वकील की तरह रखना उन्हें आता था। उनका शोषण किया गया राजनीति में। उनके श्रम का इस्तेमाल भी आजकल की व्यावसायिक और ठर्र राजनीति कहां कर सकती है। समाज और नेताओें ने उनका सम्मान जरूर किया। यह उनका मुनासिब मूल्यांकन नहीं हुआ। प्रारब्ध उन्हें ज्यादा अच्छी भूमिका दे सकता था। प्रारब्ध ने कंजूसी की।

मामाजी मितव्ययी थे। मैं उन्हें कंजूस कहता। वे हंसकर टाल जाते। लेकिन बटुआ खोलकर उदारता नहीं दिखाते। वे बीच बीच में कलकत्ता सहित कहीं पढ़ाने व भाषण देने भी जाते थे। उनकी पिछली दो पीढ़ियों ने कोरिया में न केवल हुकूमत की बल्कि भूमिसुधार, न्याय व्यवस्था और आर्थिक विकास को लेकर बहुत अधिक शोधपूर्ण दस्तोवज भी बनाए। उस परिवार की कीर्ति का कुछ लेखी में हिस्सा वे मुझे दे गए हैं। उनकी आंखों से स्नेह झरता था। हम उसमें भीगते थे। कुछ वर्षों से यह सुभाष धुप्पड़ का श्रेय हो गया कि वे हमारी मुलाकातें कराएं। सुभाष को अब सब कुछ खाली खाली लगेगा। महाराज अजातशत्रु थे। मैंने तो राजनीति में ऐसा कोई व्यक्ति उनके अतिरिक्त आज तक नहीं देखा जिसे अजातशत्रु कहा जा सकता। इस तरह के किरदारों में लालबहादुर शास्त्री सबसे पहली पायदान पर होते हैं।

अर्जुनसिंह, श्यामाचरण शुक्ल, दिग्विजय सिंह वगैरह के करीबी रहे महाराज विश्वनाथ प्रताप सिंह और उनके भाईसंत बख्श सिंह और परिवार जनों के वे करीब और सहपाठी थे। विश्वविद्यालय में पढ़ते हुए विश्वनाथ सिंह उनकी बौद्धिकता का लोहा मानते थे। महाराज कई बड़े परिवारों में बेहद आत्मीय थे। वह बहुत बड़ा कुनबा उनके सन्यस्त जीवन के कारण बहुत प्रचार के मूल्य का नहीं है। वे अविवाहित थे। इसलिए उनका रक्तप्रपंची वंश भी आसपास का नहीं है। उसके बदले हम लोग हैं। हमारी तरह के बहुत लोग हैं। कोरिया के महाराज सबसे बड़े जनसेवक थे। इसीलिए उन्हें चुनाव में हराना बहुत मुश्किल था।
महाराज बहुत उम्दा फोटोग्राफर थे। उनके द्वारा खींची गई कई तस्वीरें नामचीन लोगों के पास हैं और नामालूम लोगों के पास भी। वे मेरी कुछ दुर्लभ तस्वीरें खींचना चाहते थे जिससे मैं किसी भी व्यावसायिक फोटोग्राफर को चुनौती दे सकूं कि वह उससे बेहतर तस्वीर खींचकर दिखा दे। उन्होंने कैमरा हाथ में ले ही लिया था। फिर कुछ न कुछ व्यवधान आ गया। तारीख बढ़ती गई। हंसकर कहते तुम वकील हो केवल तुमको ही नहीं दिक्कतों के कारण हमको भी पेशी लेना आता है। ऐसा कहते उनकी आंखों में कैमरे की चमक होती। वहां मेरी तस्वीर स्थायी रूप से खिंच गई मुझे ही दिखती थी।

मैं उनसे मजाक में कहता मामाजी अपने पुरखों को याद करिए। उन्हें प्रणाम करिए। उन्होंने अपना नाम सोचकर रखा है। जिस तरह राम मर्यादा में रहते थे। वह आपके नाम का पहला अक्षर है। आप सामंत होकर भी सूर्य की तरह नहीं दमकते हैं। आपमें चंद्रमा की शीतलता है। अपनी बेहद विनम्रता में ढंके हुए आपमें एक सिंह की तरह खुद्दारी है और आप आज की दुनिया के कहां हो। ऐसे गुण तो देवों में पाए जाते हैं। वे खिलखिलाकर हंसते और कहते भांजे तुम जो चाहो सो कह सकते हो। इतिहास में कोई भांजा मामा के अनुकूल कहां हुआ है। लेकिन याद  रहे अगर ऐसी तारीफ करने के बाद कुछ मिठाई खाने की इच्छा है तो सुभाष को कहता हूं वो ले आएगा। मेरी जेब की तरफ मत देखो।

अब हम उनकी तरफ देख भी नहीं पाएंगे। वे आंखें अब हमारे अंतर में उनके चेहरे को रेखांकित करने की कोशिश कर रही हैं। उनका कबीर जैसा फक्कड़ स्वभाव अगर हमारी आत्मा के अंश में सौंवा हिस्सा भी बन सके तो हम जैसे लोगों से वो रिश्ता कबूल कर लेंगे।

(सीनियर एडवोकेट एवं चिंतक कनक तिवारी की फेसबुक वाल से)

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