बस की सीटें फुल क्यों नहीं हुई, क्या राहुल की लीडरशिप को अभी और आजमाना बाकी है?

रायपुर के स्वामी विवेकानंद हवाईअड्डे से जब एक बस पर सवार होकर यूपीए के नेता बलवीर जुनेजा इनडोर स्टेडियम के लिए निकले तो विपक्षी एकता की मजबूती दिखाई दे रही थी। शपथ समारोह में देशभर से आए मोदी विरोधी दलों के शीर्ष नेताओं ने शपथ समारोह के बाद एक साथ उठाया तो यह सिर्फ छत्तीसगढ़ में 15साल बाद भाजपा को सत्ता से बाहर करने का उल्लास नहीं था बल्कि वे यह बता रहे थे कि अगले साल मई में होने वाले चुनाव में वे मौजूदा केन्द्र सरकार के लिए कड़ी चुनौती खड़ी कर रहे हैं।

न सिर्फ छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल बल्कि मध्यप्रदेश में कमल नाथ और राजस्थान में अशोक गहलोत के शपथ समारोहों में भी यही नजारा था। पर सपा नेता अखिलेश यादव, बसपा सुप्रीमो मायावती और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बेनर्जी ने इन कार्यक्रमों से दूरी बनाकर रखी। तृणमूल कांग्रेस नेता ममता बेनर्जी ने दिनेश त्रिवेदी को इन समारोहों में भेजा था। बेनर्जी के बारे में यह जानकारी भी दी गई कि वे स्वास्थ्यगत कारणों से नहीं पहुंच सकीं।

मायावती, अखिलेश और ममता का इन शपथ समारोहों से दूर रहना क्या उनकी चिंता को दर्शाता है? हो सकता है उन्हें लगता हो कि राहुल गांधी की सफलता पर वे मुहर लगाएंगे तो उन्हें अपने प्रदेशों में कांग्रेस की चुनौती भारी पड़ेगी। यह आने वाले तीन महीनों में साफ हो जाएगा कि गठबंधन का स्वरूप क्या होगा, उसका नेतृत्व सामूहिक होगा यह कांग्रेस के पास होगा।

हो सकता है मायावती, अखिलेश की भी अलग-अलग कारणों से व्यस्तता रही होगी पर इसके कुछ और मायने भी हो सकते हैं। इनका छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में कांग्रेस के साथ चुनाव गठबंधन का प्रयास विफल हो गया। कांग्रेस का कहना था कि मायावती ज्यादा सीटें मांग रही थीं। बसपा ने तब छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी की पार्टी जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ से गठबंधन किया। प्रदेश की सभी 90 सीटों पर उन्होंने चुनाव लड़ा, पर मिली उम्मीद से बहुत कम, सिर्फ सात सीटें। बसपा के पास हर बार एक दो या कभी-कभी तीन सीटें छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश विधानसभा में रही हैं। बची पांच जोगी कांग्रेस की सीटों में दो पर तो जोगी दम्पती को ही जीत मिली है। जोगी की मरवाही सीट उनके लिए हमेशा सबसे सुरक्षित सीट मानी जाती रही है। कांग्रेस को मिले तीन चौथाई बहुमत के बाद तो उनकी भूमिका भी  सरकार चलाने में प्रासंगिक नहीं रह गई। उनके नेताओं के बयान से यह पता चलता है कि सरकार बनने से पहले वे कम से कम अपने-आपको इस स्थिति में तो सोच ही रहे थे कि कांग्रेस हो या भाजपा, सरकार बनाने के लिए उनके समर्थन की जरूरत पड़ेगी। मायावती ने तो चुनाव परिणामों में गठबंधन को कम सीटें मिलने का ठीकरा भी जोगी पर फोड़ा। उन्होंने कहा कि उनके बयानों की वजह से बसपा के परम्परागत वोट भाजपा को चले गए। जोगी ने शपथ लेकर कहा था कि वे किसी भी सूरत में भाजपा को समर्थन नहीं देंगे। लोकसभा चुनाव में परिस्थितियां अलग रहेंगी-क्योंकि यह गठबंधन कई सीटों पर दूसरे और तीसरे स्थान पर रहा है।

छत्तीसगढ़ में सरकार बनाने में दखल दे पाने की स्थिति तो बनी नहीं, मध्यप्रदेश में भी निर्दलियों के समर्थन के बाद कांग्रेस ने सरकार बनाने के लिए बसपा और सपा की ओर बहुत उत्साह नहीं दिखाया। हालांकि दोनों ही दलों ने कांग्रेस को समर्थन देने की घोषणा कर दी।

कांग्रेस के पक्ष में अब स्थितियां बदल रही हैं पर बीते बरसों में कई दूसरे राज्यों की तरह उत्तरप्रदेश और पश्चिम बंगाल में भी वह लगातार कमजोर होती गई। चाहे उसने गठबंधन के साथ चुनाव लड़ा हो या अकेले। लोकसभा में कांग्रेस की ऐतिहासिक सिर्फ 44 सीटें होने का कारण इन दोनों राज्यों में मिली विफलता भी है। मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ की 65 में से 63 सीटें भाजपा के पास थीं। मोदी सरकार के खिलाफ उपजे असंतोष को देखते हुए इन प्रदेशों में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने अपना जनाधार बढ़ाने की कोशिश इस विधानसभा चुनाव में की, लेकिन अपेक्षित सफलता मिली नहीं। इन चुनावों से राहुल गांधी की विश्वसनीयता और स्वीकार्यता बढ़ी। दो दर्जन से अधिक मोदी विरोधी दलों के नेताओं की इन शपथ समारोह में मौजूदगी ने मोदी विरोधी दलों की एकजुटता को तो प्रदर्शित किया ही है, भविष्य में प्रस्तावित महागठबंधन का नेतृत्व वे कांग्रेस को सौंपने के लिए उत्सुक भी दिखाई दे रहे हैं। ऐसा लगता है, मायावती, अखिलेश यादव, ममता बेनर्जी आदि कई क्षेत्रीय नेता अभी इस पर सहमत नहीं है। वे अपने-अपने प्रदेशों में ही प्रभावी हैं, पर कांग्रेस ने इन तीन राज्यों के अलावा, गुजरात और कर्नाटक में भी बेहतर प्रदर्शन किया था। मायावती, अखिलेश और ममता का इन शपथ समारोहों से दूर रहना क्या उनकी चिंता को दर्शाता है? हो सकता है उन्हें लगता हो कि राहुल गांधी की सफलता पर वे मुहर लगाएंगे तो उन्हें अपने प्रदेशों में कांग्रेस की चुनौती भारी पड़ेगी। यह आने वाले तीन महीनों में साफ हो जाएगा कि गठबंधन का स्वरूप क्या होगा, उसका नेतृत्व सामूहिक होगा यह कांग्रेस के पास होगा।

 

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